सरदारव्पारस
विशेषताएं- जैविक क्रियाओं को उत्तेजित करता है। पौध वृद्धि में सहायक होता है। इसके प्रभाव से जमीन की जैविक, भौतिक व रासायनिक स्थिति उत्तम होती है। जिससे उन्नत किस्म की फल सब्जियॉ जैसे-अनार, अंगूर, अनाज, गन्ना, आलू अन्य सब्जियॉ आश्चर्यजनक रूप से पैदा होती है। निरन्तर बदलते हुये वातारण्, पौधे को बदलते हुए वातावरण के अनुरूप बदलने के लिए विवश करता है। इस स्थिती में पौधा अपनी ऊर्जा को सुरक्षित रखने के लिए अन्य सभी गतिविधियॉ श्वसन क्रिया, उर्जा निर्माण, स्थानातरण आदि को धीमा कर देता है। इससे पौधे पर अनचाहा दबाव पड़ता है। इस तनाव के चलते पौधा अपनी अनुवांशिक क्षमता के अनुसार विकास नही कर पाता। फसल को तनाव की स्थिती से उबारना किसान की प्रमुख चुनौतियों में से एक है। तनाव निम्न प्रकार के होंते है। हवामान निर्मित तनाव- ठण्ड, गर्मी तेज हवा, सतत वर्ष या जलमग्न स्थिती, सूखापन आदि परिस्थितियों पौधा अपने पर्णरंध्र को बंद करता है इससे स्वसन क्रिया मंद हो जाती है, प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में कम होती है, पोषण का उपाचयन में कमी होती है, उर्जा का निर्माण कम होता है। उर्जा की कमी होने से पौधे की वृद्धि तथा फल का आकार वजन गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ता है तथा पैदावार प्राभावित होती है। जैविक तनाव- कीट प्रकाप, फंफूद, बैक्टिरिया, वायरस तथा सूत्रकृमि आदि सभी पौधे के पोषण से पोषित होकर फसल को नुकसान पहॅुचाते है। इससे पौधे की शारीरिक विकास, प्रत्युत्पादन में अवरोध उत्पन्न होता है तथा गिरावट आजाती है। पौधे वृद्धि अवस्था संबधित तनाव- बीज से आरंभ होकर बीज बनने तक की अपने जीवनकाल में एक पौधे को विभिन्न अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है हर अवस्था से गुजरने पर फसल का अत्यधिक तनाव का सामन करना पड़ता है। इससे पौधे वृद्धि पुष्पन, फलनिर्माण, फल विकास तथा पक्वता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। खेत प्रबंधन तनाव- प्रत्यारोपड़, कुलपा चलाना, मिटटी चढ़ाना आदि खेती संबधित शल्य क्रियाओं के दौरान पौधे के विभिन्न अंगों पर चोट लगती है तथा वृद्धि में बाधा आती है। रासायनिक तनाव- खरपतवारनाशी, कीट-फफूंदनाशी रसायनों के प्रभाव से होने वाले कुप्रभाव। इससमें अंकुरण पश्चात उपयोग में लेने वाला खरपतवारनाशी सबसे ज्यादा तनाव पैदा करते है। इससे 8-10 दिन तके पौध की वृद्धि रूक जाती है। अरंभिक वृद्धि के स्गिन के चलते मुख्य तनों में कम गठानें बनती है।और शाखाओं की संख्या में भी कमी होती है और पैदावार में कमी आती है। पौधे को हमेशा किसी ना किसी तनाव की स्थिती से गुजरना पड़ता है तनाव निवारण कुशल फसल प्रबंधन का मुख्य अंग है। तनाव के दौरान स्थगित हुए पौध विकास को समतोल आहार से कैसे बढ़ाया जाये, यह प्रश्न कृषि विशेषज्ञों के मन में आया। हम सभी जानते है कि किसी भी जीव के विकास के लिए समतोल पोषण अति आवश्यक है। ठोस किए गए। इससे अदभुत परिणाम सामने आए पौधों पर पड़ने वाले तनाव का पूर्ण रूप से निवारण हो चुका था तथा साथ ही उत्पाद में तेल, प्रोटीन एवं वसा के स्तर में बढ़ोत्तरी और पैदावार में वृद्धि भी पाई गयी। पारस में - 80 प्रतिशत ह्मुमिक एसिड, 10 प्रतिशत अमोनिया एसिड, 10 प्रतिशत सी0वीक0 एक्स्ट्रेक्ट उपयोग विधि एवं मात्रा-200 ग्राम प्रतिबीघा, 25 दिन में पुनः प्रयोग। मृदा में नया जीवन देने हेतु पारस का उपयोग कर अधिक भरपूर पैदावार प्राप्त करें।