भारत खेतों से सीधे सॉफ़्टवेयर पर पहुँच गया। 1990 के दशक ने हमें दुनिया का बैक ऑफ़िस और सेवाओं में अगुआ बनाया, लेकिन बीच का वह पड़ाव छूट गया जहाँ एक देश अपने सौ करोड़ लोगों को चीज़ें बनाने के काम में लगाता है। चीन ने वह पड़ाव नहीं छोड़ा। उसने फ़ैक्ट्रियाँ, सप्लाई चेन और ऐसे मार्केटप्लेस बनाए जिनसे दुनिया का कोई भी ख़रीदार एक दोपहर में चीनी फ़ैक्ट्री ढूँढ़ लेता है, और वह दुनिया की फ़ैक्ट्री बन गया।
माँग आख़िरकार भारत की ओर मुड़ रही है। जो नहीं मुड़ा है, वह है भरोसा। जिस ख़रीदार को आज भारत से एक लाख कोरुगेटेड बॉक्स या एक टन गुआनिडीन नाइट्रेट चाहिए, वह ऐसी डायरेक्टरियों में उलझता है जहाँ ऊपर वे ट्रेडर हैं जिन्होंने वहाँ रहने के पैसे दिए, और हफ़्तों यह पता करने में लगाता है कि मशीन असल में किसकी है। भारतीय फ़ैक्ट्रियाँ असली हैं। बस वे पढ़ी नहीं जा सकतीं।
BharatSeal इसी एक चीज़ को ठीक करने के लिए बना है। यह उस ख़रीदार, जिसे फ़ैक्ट्री चाहिए, और उस फ़ैक्ट्री, जिसे मिलना चाहिए, के बीच का पुल है, और इसकी हर तख़्ती एक सरकारी रिकॉर्ड है।